
ग्रेटर नोएडा में युवराज की मौत को अगर हादसा कहा जा रहा है, तो यह शब्द की सबसे बड़ी बेइज्जती है। यह मौत किसी कुदरती आपदा का नतीजा नहीं, बल्कि नोएडा अथॉरिटी की लापरवाही, भ्रष्टाचार और आपराधिक चुप्पी की उपज है। सवाल सीधा है- जब न नदी उफनी, न समंदर में तूफान आया, तो आखिर एक युवक बेसमेंट में डूबकर कैसे मर गया?
ग्रेटर नोएडा के बेसमेंट अब पार्किंग नहीं, बल्कि मौत के कुएं बन चुके हैं। नियम कहते हैं कि बेसमेंट का उपयोग सीमित और सुरक्षित होना चाहिए, लेकिन हकीकत यह है कि इन्हें दफ्तर, गोदाम और व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। यह सब कुछ नोएडा अथॉरिटी की जानकारी में है, बल्कि कई मामलों में उसकी मौन सहमति से हो रहा है। अगर ऐसा नहीं है, तो सवाल उठता है-कितने अवैध बेसमेंट आज तक सील किए गए?
शहर की ड्रेनेज व्यवस्था वर्षों से दम तोड़ चुकी है। हल्की बारिश में ही सड़कें तालाब बन जाती हैं और पानी निचले हिस्सों में भर जाता है। इसके बावजूद ड्रेनेज सुधार के नाम पर सिर्फ टेंडर, फाइलें और कमीशन चलते रहे। जमीनी हकीकत देखने कोई अधिकारी नहीं उतरा। निरीक्षण कागजों पर हुआ और सुरक्षा मानकों को नजरअंदाज कर दिया गया।
युवराज की मौत इस सड़ी हुई व्यवस्था पर सीधा आरोप है। यह सवाल पूछना जरूरी है कि बेसमेंट में पानी भरने से पहले क्या कोई चेतावनी नहीं थी? क्या अथॉरिटी को इसकी जानकारी नहीं थी? और अगर थी, तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की गई? जवाब साफ है- क्योंकि यहां कार्रवाई से ज्यादा जरूरी मैनेजमेंट है।
हर बार की तरह इस बार भी जांच के आदेश दिए गए, बयान जारी हुए और संवेदनाएं प्रकट कर दी गईं। लेकिन जनता पूछ रही है- पिछली जांचों का क्या हुआ? कितने अफसरों पर FIR दर्ज हुई? कितनों को जेल भेजा गया? सच यह है कि बड़े अफसर हमेशा बच निकलते हैं और मरने वाला आम नागरिक ही होता है।
यह संपादकीय सिर्फ युवराज के लिए नहीं, बल्कि हर उस नागरिक के लिए है जो इस सिस्टम के भरोसे जी रहा है। अगर अब भी दोषी अधिकारियों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं हुई, अगर अवैध बेसमेंट तुरंत सील नहीं किए गए और ड्रेनेज व्यवस्था नहीं सुधरी—तो यह मान लिया जाए कि प्रशासन ने ऐसी मौतों को स्वीकार कर लिया है।आज सवाल युवराज का है, कल किसी और का होगा। फर्क सिर्फ नाम का होगा, लापरवाही वही रहेगी।









