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राहुल गांधी की बिहार यात्रा- राजनीति में ‘नदी’ का नया प्रतीक

राहुल गांधी की बिहार यात्रा
राहुल गांधी की बिहार यात्रा
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Written by
Rishabh Rai

बिहार की चुनावी सरगर्मी के बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी का बेगूसराय की एक नदी में उतरना केवल एक तैराकी नहीं था, बल्कि एक गहरी राजनीतिक प्रतीकात्मकता लिए हुए कदम था। यह दृश्य जहां राहुल गांधी सुरक्षा घेरे से बाहर निकलकर स्थानीय युवाओं के साथ नदी में उतरे- एक साधारण घटना लग सकती है, पर राजनीति की भाषा में यह एक सशक्त संदेश है।

बिहार की राजनीति दशकों से जातीय समीकरणों, विकास के वादों और सत्ता की जटिल जोड़-घटावों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। ऐसे में राहुल गांधी का यह कदम “जनता से जुड़ने” का एक नया प्रयास प्रतीत होता है। उनके इस अंदाज में न केवल सादगी और सहजता दिखी, बल्कि यह भी कि कांग्रेस अब पारंपरिक राजनीति के ढर्रे से हटकर ‘जन-संवेदना’ की नई परिभाषा गढ़ना चाहती है।

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नदी, भारत की संस्कृति में केवल जलधारा नहीं, बल्कि जीवन, संघर्ष और पुनर्जन्म का प्रतीक है। बिहार की गंगा और उसकी सहायक नदियाँ न केवल कृषि की जीवनरेखा हैं, बल्कि राजनीति की दिशा भी तय करती रही हैं। राहुल गांधी का इस नदी में उतरना इस बात का प्रतीक माना जा सकता है कि वे देश की मिट्टी, उसके जल और जनता के बीच अपनी जड़ें तलाशना चाहते हैं — शायद अपने राजनीतिक अस्तित्व का पुनर्जन्म भी।

राजनीतिक रूप से यह यात्रा उस समय हो रही है जब बिहार में एनडीए और महागठबंधन के बीच मुकाबला अपने चरम पर है। राहुल गांधी का यह जमीनी रुख कांग्रेस के पुनरुत्थान की नई कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। परंतु यह भी सच है कि तस्वीरें और प्रतीक तभी असरदार होते हैं जब उनके पीछे स्थायी राजनीतिक संकल्प और ठोस संगठनात्मक शक्ति हो।

यदि राहुल गांधी इस जन-संपर्क की “नदी” को निरंतर बहाव में रख पाते हैं, तो यह कांग्रेस के लिए एक नई ऊर्जा का स्रोत बन सकती है। वरना यह दृश्य केवल सोशल मीडिया की लहरों में विलीन होकर रह जाएगा। राहुल गांधी की यह तैराकी महज एक ताज़गी भरा क्षण नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद का नया तरीका भी है- जो यह बताता है कि जनता से जुड़ने के लिए कभी-कभी नेता को मंच से उतरकर नदी में भी उतरना पड़ता है।

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