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बिहार की धरती पर फीकी पड़ रही मोदी लहर, तिकड़ी बनकर उभरे राहुल–तेजस्वी–अखिलेश

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Written by
Rishabh Rai

बिहार की राजनीति ने वह तस्वीर दिखा दी है, जिसका डर भाजपा को लंबे समय से था। कभी चुनावी सभाओं में “मोदी–मोदी” के नारे गूँजते थे, वहीं अब राहुल गांधी, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव की जुगलबंदी ने भीड़ और जनभावनाओं पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया है।

मोदी की लहर से मोहभंग

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता, जिस पर भाजपा ने एक दशक से ज़्यादा समय तक अपना सियासी किला खड़ा किया, अब दरकती नज़र आ रही है। बेरोज़गारी, महँगाई और युवाओं के सपनों से जुड़ी ठोस नीतियों के अभाव ने बिहार की जनता को निराश किया है। मोदी का करिश्मा, जो कभी हर सभा को उत्सव में बदल देता था, अब थकान और दोहराव में बदलता जा रहा है।

तिकड़ी का नया उत्साह

राहुल गांधी की वोटर अधिकार यात्रा में जिस जोश और समर्थन का नज़ारा दिखा, उसने यह साफ़ कर दिया कि जनता बदलाव चाहती है। मंच पर जब राहुल के साथ तेजस्वी और अखिलेश आए, तो वह तस्वीर न सिर्फ विपक्ष की एकता का प्रतीक बनी, बल्कि बिहार की जनता के लिए एक नई उम्मीद भी। तेजस्वी यादव का मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित होना युवाओं में जोश भर रहा है, जबकि राहुल और अखिलेश का जुड़ना इस आंदोलन को राष्ट्रीय आयाम दे रहा है।

भाजपा की बौखलाहट

भाजपा नेताओं की भाषा और प्रतिक्रियाएँ यह दिखा रही हैं कि वे असहज हैं। राहुल गांधी के भाषणों पर आपत्ति जताना, सभाओं को “नाटक” बताना और चुनाव आयोग को घसीटना—यह सब संकेत हैं कि भाजपा विपक्षी लहर से डर रही है। यह वही भाजपा है, जो कभी अपने आत्मविश्वास से विपक्ष को मज़ाक मानती थी।

बदलाव की आहट

बिहार हमेशा राजनीतिक बदलाव की धरती रही है। जेपी आंदोलन से लेकर मंडल राजनीति तक, इस राज्य ने पूरे देश की दिशा बदली है। अब राहुल–तेजस्वी–अखिलेश की तिकड़ी वही भूमिका निभाती नज़र आ रही है। मोदी की छवि पर जमी चमक उतर रही है और विपक्ष के चेहरे पर नया आत्मविश्वास दिख रहा है।

आज का सबसे बड़ा सच यही है कि बिहार की हवा बदल रही है। मोदी की लोकप्रियता में गिरावट और विपक्ष की एकता का उत्साह—दोनों ने मिलकर सत्ता के समीकरण को चुनौती दे दी है। सवाल अब यह नहीं कि भाजपा जीतेगी या हारेगी, बल्कि यह है कि मोदी की चमक खोने के बाद विपक्ष किस हद तक जनता के सपनों को साकार कर पाएगा।

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