
संपादकीय- ऋषभ राय
“मुझे तो लगता है हनुमान जी पहले अंतरिक्ष यात्री थे…”
ये शब्द किसी धार्मिक कथा मंच के कथावाचक के नहीं हैं। ये भारत सरकार के पूर्व केंद्रीय मंत्री और भाजपा सांसद अनुराग ठाकुर के हैं, जो उन्होंने स्कूली बच्चों के सामने कहे, वो भी कब राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस पर, अरे सांसद जी माना की आपके बेटे दूसरे देश में पढ़ रहे है, लेकिन इन बच्चों के साथ तो ये मजाक ना करों.. जिस देश का अंतरिक्ष संगठन ISRO आज दुनिया के सबसे उन्नत और कम बजट में मिशन सफल करने वाले संस्थानों में गिना जाता है, वहाँ जब देश का एक वरिष्ठ नेता, वो भी विज्ञान से जुड़े मंच पर, पौराणिक कथा को विज्ञान का स्थान दे, तो यह केवल ज्ञान का अपमान नहीं होता, बल्कि बुद्धि की सामूहिक हत्या होती है।
ये “मुझे लगता है” वाला ज्ञान देश को कहां ले जाएगा?
बच्चों से सवाल पूछा गया- “पहला अंतरिक्ष यात्री कौन था?”
बच्चों ने कहा- “नील आर्मस्ट्रॉन्ग।”
लेकिन सांसद जी बोले- “मुझे तो लगता है हनुमान जी थे।”
“मुझे लगता है?”
- क्या देश अब “मुझे लगता है” से चलेगा?
- तो फिर “मुझे लगता है” कि गूगल की जगह नारद मुनि पहले संवाददाता थे,
- “मुझे लगता है” कि गणेश जी की सूंड प्लास्टिक सर्जरी का प्रमाण है,
- “मुझे लगता है” कि समुद्र मंथन में परमाणु ऊर्जा थी।
और “मुझे लगता है” कि अगर ऐसे बयानों पर ताली बज रही है, तो देश की ताली बजने में अब देर नहीं। वैसे भी ताली बजने का प्रचलन कोरोना काल से कुछ ज्यादा ही चल गया है.
विज्ञान दिवस पर पौराणिक कथा- एजेंडा है या अज्ञानता?
वेद, पुराण, उपनिषद भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं। इनमें गहराई है, दर्शन है, नैतिकता है. लेकिन इन्हें जबरन विज्ञान की प्रयोगशाला में घुसाना, बच्चों को यह सिखाना कि पौराणिक पात्र वास्तव में अंतरिक्ष यात्री थे, यह तथ्यों की नहीं, सत्ता की सुविधा के लिए गढ़ी गई कहानियां हैं। यही काम जब मंत्री करते हैं, और वह भी स्कूली बच्चों के सामने, तो वह गलतफहमी नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई बौद्धिक हिंसा है।
क्या यही है “विकसित भारत” का विज़न?
जब प्रधानमंत्री “विकसित भारत 2047” की बात करते हैं, तब हम उम्मीद करते हैं कि देश का हर बच्चा विज्ञान, तर्क और तकनीक में सशक्त हो। लेकिन उसी सरकार के नेता जब बच्चों को उल्टी गंगा बहाना सिखाएं तो फिर सवाल उठता है:
क्या यह शिक्षा को पौराणिक अंधश्रद्धा में धकेलने की संगठित कोशिश है?
क्या मंत्री जी को यह नहीं मालूम कि
- पहला इंसान जिसने अंतरिक्ष में कदम रखा, वह यूरी गगारिन (1961) था।
- पहला इंसान जिसने चांद पर कदम रखा, वह नील आर्मस्ट्रॉन्ग (1969) था।
- भारत के पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा (1984) थे।
- और आज गगनयान मिशन की तैयारी में भारत के वैज्ञानिक रात-दिन एक कर रहे हैं।
अगर आप वास्तव में बच्चों को प्रेरणा देना चाहते थे, तो उन्हें ISRO की उपलब्धियां, कल्पना चावला, सुनिता विलियम्स, राकेश शर्मा, और गगनयान के बारे में बताते। लेकिन नहीं आपको मंच मिला तो आपने वह किया जो आजकल एक खास एजेंडे का हिस्सा बनता जा रहा है. पौराणिकता को विज्ञान बनाओ, और विज्ञान को बहस से बाहर रखो।
क्या भारत को ‘विश्वगुरु’ ऐसे ही बनाना है?
“विश्वगुरु” बनने की बात बहुत होती है। लेकिन क्या तर्क-विरोधी बयान, मिथकों को वैज्ञानिक प्रमाण मानना, और बच्चों को तथ्य से काटकर आस्था की अफीम पिलाना. क्या ये रास्ता है “विकसित भारत” का?जरा सोचिए अगर अमेरिका के नासा, रूस के रोसकॉसमोस या यूरोपियन स्पेस एजेंसी में कोई नेता जाकर कहे कि “हमारे पौराणिक पात्र पहले अंतरिक्ष यात्री थे”, तो दुनिया हमें क्या मानेगी?
विकासशील राष्ट्र या मनोरंजन स्थल?
मंत्री जी को यह समझना होगा कि स्कूली छात्र राजनीतिक भाषण सुनने नहीं आते। वे प्रेरणा लेने आते हैं, सीखने आते हैं।
आपका काम है कि उनकी सोच को तेज करें उन्हें भ्रमित नहीं।








